Sunday, 25 January 2009

लोकतंत्र

लोकतंत्र
एक असफल शासन प्रणाली
धूर्तों की क्रीड़ा
मासूमों की पीड़ा
पराजित जीवन मूल्य
विजित नैतिकता
दानवों का अट्टाहस
देवों का रूदन
नेता सूत्रधार
जनता कठपुतली
नित्य नवीन योजनाएँ
बहुत सी वर्जनाएँ
संसद में शोर
आतंक का जोर
आरोप-प्रत्यारोप
निष्कर्ष-----?
शून्य --
टूटते विश्वास
खंडित प्रतिमाएँ
धार्मिक संकीर्णताएँ
चहुँ दिशि आहें
ऊफ़! ये लोकतंत्र

Saturday, 24 January 2009

सुभाष


हमारे इतिहास में सुभाष के अतिरिक्त ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ जो एक साथ महान सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरूषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर चर्चा करने वाला, तथा कूटनीतिग्य हो। उन्होने करीब-करीब पूरे यूरोप में भारत की स्वतंत्रता के लिए अलख जगाया। वे प्रकृति से साधु, ईश्वर भक्त तथा तन एवं मन से देशभक्त थे। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसका मार्ग कभी भी स्वार्थों ने नहीं रोका, जिसके पाँव लक्ष्य से पीछे नहीं हटे, जिसने जो भी स्वप्न देखे, उन्हें साधा और जिसमें सच्चाई के सामने खड़े होने की अद्भुत क्षमता थी।
अल्पावस्था में अंग्रेजों का भारतीयों के साथ व्यहार देखकर पूछ बैठे- दादा हमें कक्षा में आगे की सीटों पर बैठने क्यों नहीं दिया जाता ? वह जो भी करता, आत्म विश्वास से करता। अंग्रेज अध्यापक उसके अंक देखकर हैरान रह जाते। कक्षा में सबसे अधिक अंक लाने पर भी जब छात्र वृत्ति अंग्रेज बालक को मिली तो उखड़ गया। मिशनरी स्कूल छोड़ दिया। उसी समय अरविन्द ने कहा- हममें से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हजारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द उसके मस्तिष्क में गूँजते थे।
सुभाष सोचते- हम अनुगमन किसका करें? भारतीय जब चुपचाप कष्ट सहते तो वे सोचते-धन्य हैंये वीर प्रसूत। ऐसे लोगों से क्या आशा की जासकती है?
वे अंग्रेजी शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा मानते थे। किन्तु पिता ने समझाया -हम भारतीय जब तक अंग्रेजों से प्रशासनिक पद नहीं छीनेंगें,तब तक देश का भला कैसे होगा ? सुभाष आई सी एस की परीक्षा में बैठे।वे प्रतियोगिता में उत्तीर्ण ही नहीं हुए, चतुर्थ स्थान पर रहे। किन्तु देश की दशा से अनभिग्य नहीं थे। नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। सारा देश हैरान रह गया। उन्हें समझाते हुए कहा गया- तुम जानते भी हो कि तुम लाखों भारतीयों के सरताज़ होंगें?हज़ारों हज़ार तुम्हारे देशवासी तुम्हें नमन करेंगें?सुभाष ने कहा- मैं लोगों पर नहीं उनके मनों पर राज्य करना चाहता हूँ। उनका हृदय सम्राट बनना चाहता हूँ।
वे नौकरी छोड़ भारत आगए। २३ वर्ष का नवयुवक विदेश से स्वदेशी बनकर लौटा। इस समय पूरा देश किसी नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रहा था। सुभाष पूरे देश को अपने साथ ले चल पड़े। वे गाँधी जी से मिले। उनके विचार जाने , पर उनको यह बात समझ नहीं आई कि आन्दोलनकारी हँसते-हँसते लाठियाँ खा लेंगें। कब तक? वे चितरंजन दास जी के पास गए। उन्होने उनको देश को समझने और जानने को कहा। सुभाष देश भर में घूमें और निष्कर्ष निकाला- हमारी सामाजिक स्थिति बद्तर है,जाति-पाति तो है ही, गरीब और अमीर की खाई भी समाज को बाँटे हुए है। निरक्षरता देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। इसके लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होने कहा- मैं देश से अंग्रेजों को निकालना चाहता हूँ। मैं अहिंसा में विश्वास रखता हूँ किन्तु इस रास्ते पत चलकर स्वतंत्रता काफी देर से मिलने की आशा है। उन्होने क्रान्तिकारियों को सशक्त बनने को कहा।वे चाहते थे कि अंग्रेज भयभीत होकर भाग खड़े हों। वे देश सेवा के काम पर लग गए। दिन देखा ना रात। उनकी सफलता देख देशबन्धु ने कहा था- मैं एक बात समझ गया हूँ कि तुम देश के लिए रत्न सिद्ध होंगें।
अंग्रेजों का दमन चक्र बढ़ता गया। बंगाल का शेर दहाड़ उठा- दमन चक्र की गति जैसे-जैसे बढ़ेगी, उसी अनुपात में हमारा आन्दोलन बढ़ेगा। यह तो एक मुकाबला है जिसमें जीत जनता की ही होगी। अंग्रेज जान गए कि जब तक सुभाष, दीनबन्धु,मौलाना,और आज़ाद गिरिफ्तार नहीं होते, स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। उन्होने कहा- सबसे अधिक खतरनाक व्यक्तित्व सुभाष का है। इसने पूरे बंगाल को जीवित कर दिया है।
इन्हें गिरिफतार कर लिया गया। मातृभूमि के प्रति , उसकी पुन्य वेदी पर इनका पहला पुण्य दान था।
सुभाष ने जेल में चितरंजन दास जी से काफी अनुभव प्राप्त किया। उन्हें मुसलमानों से भी पूर्ण समर्थन मिला। वे कहते थे- मुसलमान इस देश से कोई अलग नहीं हैं। हम सब एक ही धारा में बह रहे हैं। आवश्यकता है सभी भेदभाव को समाप्त कर एक होकर अपने अधिकारों के लिए जूझने की। ६ महीनों में ग्यान की गंगा कितनी बही, किसी ने न देखा किन्तु जब वह जेल से बाहर आए तो तप पूत बन चुके थे। इसी समय बंगाल बाढ़ ग्रस्त हो गया। सुभाष ने निष्ठावान युवकों को संगठित किया और बचाव कार्य आरम्भ कर दिया। लोग उन्हें देखकर सारे दुःख भूल जाते थे।
वे बाढ़ पीड़ितों के त्राता बन गए। सुभाष चितरंजन जी की प्रेरणा से २ पत्र चलाने लगे। साधारण से साधारण मुद्दों से लेकर सचिवालय की गुप्त खबरों का प्रकाशन बड़ी खूबी से किया। कोई भारतीय इतना दबंग हो सकता है -अंग्रेज हैरान थे। १९२४ को पुनः गिरिफ्तार हुए। कुछ समय बाद उन्हें माँडले जेल लेजाया गया। सुभाष ने कहा- मैं इसे आज़ादी चाहने वालों का तीर्थ स्थल मानता हूँ। मेरा सौभाग्य है कि जिस स्थान को तिलक, लाला लाजपत राय, आदि क्रान्तिकारियों ने पवित्र किया , वहाँ मैं अपना शीष झुकाने आया हूँ।
सारा समय स्वाध्याय में लगाया। वहाँ जलवायु वर्षा, धूप, सर्दी का कोई बचाव ना था और जलवायु शिथिलता पैदा करती थी, जोड़ों के अकड़ जाने की बीमारी होती थी तथा बोर्ड लकड़ी के बने थे। अंग्रेज बार-बार उनको जेल भेजते रहे और रिहा करते रहे। उन्होने एक सभा में कहा- यदि भारत ब्रिटेन के विरूद्ध लड़ाई में भाग ले तो उसे स्वतंत्रता मिल सकती है। उन्होने गुप्त रूप से इसकी तैयारी शुरू कर दी। २५ जून को सिंगापुर रेडयो से उन्होने सूचना दी कि आज़ाद हिन्द फौज का निर्माण हो चुका है। अंग्रेजों ने उनको बन्दी बनाना चाहा , पर वे चकमा देकर भाग गए।
२ जुलाई को सिंगापुर के विशाल मैदान में भारतीयों का आह्वान किया। उन्होने अपनी फौज में महिलाओं को भी भर्ती किया। उनको बन्दूक चलाना और बम गिराना सिखाया।२१ अक्टूबर को उन्होने प्रतिग्या की- मैं अपने देश भारत और भारतवासियों को स्वतंत्र कराने की प्रतिग्या करता हूँ। लोगों ने तन,मन और धन से इनका सहयोग किया। उन्होने एक विशाल सभा में घोषणा की- तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। कतार लग गई। सबसे पहले महिलाएँ आईं। आर्थिक सहायता के लिए उन्होने अपने सुहाग के आभूषण भी इनकी झोली में डाल दिए।
१९४४ में उन्होने जापान छोड़ा। १८ अगस्त को नेताजी विमान द्वारा जापान के लिए रवाना हुए और विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। लोगों को लगा कि किसी दिन वे फिर सामने आ खड़े होंगें। आज इतने वर्षों बाद भी जन मानस उनकी राह देखता है। वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है ?

Monday, 17 November 2008

चाचा नेहरू के पत्र

चाचा नेहरू एक ऐसे व्यक्तित्व रहे जिनकी आँखों में बच्चों के लिये बेहद प्रेम था तथा उनकी बाँहें बच्चों को गोद में लेने के लिए सदा आतुर रहती थी। बच्चों से उनका प्रेम असीम था। जानते हैं बच्चों! आज़ादी के लिए जब वे जेल गए, तब अपना अधिकतर समय उन्होने पत्र लेखन में बिताया। वैसे तो वे पत्र उन्होने अपनी बेटी इन्दु के नाम लिखे थे किन्तु हर बच्चा उनसे बहुत कुछ सीख सकता है। उनके कुछ उदाहरण आपके लिए प्रस्तुत कर रही हूँ-
प्यारे बच्चों !
तुम लोगों के बीच रहना मैं पसंद करता हूँ। तुमसे बातें करने में और तुम्हारे साथ खेलने में सचमुच मुझे बड़ा मज़ा आता है। थोड़ी देर के लिए मैं यह भूल जाता हूँ कि मैं बेहद बूढ़ा हो चला हूँ और मेरा बचपन मुझसे सैंकड़ो हज़ारों कोस दूर हो गया है ..... हमारा देश एक बहुत बड़ा देश है और हम सब को-मिलकर अपने देश के लिए बहुत कुछ करना है। हममें से हर कोई अगर अपने हिस्से का काम पूरा करता रहेगा तो इन सब कामों का ढेर लगता रहेगा और हमारा मुल्क तरक्की के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ेगा।
२ मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता की सभ्यता का कुछ हाल बताना चाहता हुँ। लेकिन इससे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का क्या अर्थ है। अच्छा करना, सुधारना , जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना। यह सब जानने के लिए तुमको खुद सब कथाओं को पढ़ना चाहिए।
३ अगर तुम मेरे पास होते तो मैं तुमसे उस खूबसूरत दुनिया के बारे में बातें करना पसन्द करता। मैं तुमसे फूलों और पेड़ों , परिन्दों और जानचरों, सितारों और पहाड़ों हिम की नदियों और ऐसी दूसरी अनेक चीजों के बारे में बात करता जो हमारे इर्द-गिर्द हैं। उन्होने ऐसे ही अनेक पत्र और लेख लिखे जो आज भी हम सबके लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनमें कुछ अंश तो ऐसे हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता । एक बार उन्होने कहा था- यदि कोई मुझे याद करर तो मैं चाहूँगा कि वह यह कहे कि इस आदमी ने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तान से प्यार किया और बदले में उन्होने भी उसे उतना ही चाहा और बेहद मुहब्बत दी। आपका और मेरा काम आज और कल के भारत को बनाना है। लेकिन उसके बनाने के लिए हमें अपने प्राचीन इतिहास को कुछ समझना है और उसमें जो अच्छी बातें हैं , उनका लाभ उठाना है। उसमें जो बुरी बातें हैं उनसे बचना है। लोकतंत्र का मतलब मैं यह समझता हूँ कि समस्याएँ शान्ति पूर्वक सुलझाई जाएँ। अगर आदमी में दहशत भर जाए तो वह ना ठीक से सोच सकता है, ना काम कर सकता है। खतरा चाहे मौजूद हो या आने वाला हो डर से उसका सामना नहीं किया जा सकता।
शान्ति और सत्य का रास्ता ही मनुष्य का सच्चा रास्ता है।
उन्होने कहा- परिवर्तन जरूरी है, लेकिन उसके साथ परम्परा भी जरूरी है। भविष्य की इमारत वर्तमान और अतीत की बुनियाद पर ही खड़ी होती है। अगर अपने इतिहास को हम भुला देंगें और उसे छोड़ देंगें तो हमारी जड़ें कट जाएँगी और हमारा जीवन रस सूख जाएगा।
उन्होने बच्चों को कहा- बुराई के सामने कभी सिर न झुकाना चाहिए। लेकिन बुराई का सामना डर और गुस्से से और बुरी बातों से नहीं करना चाहिए। बुराई का सामना करते समय हमें दिमाग ठंडा रखना चाहिए।
वे गरीबी और अभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसीलिए कहा- जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में गरीबी और अभाव रहेगा, दुनिया में खतरा भी बना रहेगा। धर्म का सम्बंन्ध नैतिक और सदाचार की बातों से है।
हिंसा का रास्ता वे खतरे का रास्ता बताते थे। वे काम को महत्व देते थे। इसीलिए इतने बड़े पद पर होने पर भी दिन में १८ से २० घंटे काम करते थे। वे कहते थे- मैं ऐसे आदमी चाहता हूँ जो काम को धर्म समझ कर करें। जो बुराई के सामने सिर ना झुकाएँ। सच्चाई से लड़ने के लिए तैयार रहें। उन्होने बच्चों को देश सेवा की प्रेरणा देते हुए कहा- भारत की सेवा से अभिप्राय करोड़ों लोगों की सेवा से है। इसका अर्थ है कि गरीबी, अग्यानता और असमानता समाप्त कर दी जाए। हर आँख से आँसू पोंछने का प्रयास किया जाए। परंतु जब तक लोगों की आँखों में आँसू हैं और वे पीड़ित हैं तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा।
उन्होने कहा- भारत की जनता आजादी पा चुकी है, किन्तु इसके मीठे फल का स्वाद चखने के लिए उसे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी होंगीं।
बच्चों! नेहरू जी के विषय में जितना भी लिखूँ कम है। बस यह समझ लो कि उनको बच्चों से बहुत आशाएँ थीं और आपको उनके आदर्शों पर चलकर उनका सपना पूरा करना है। ईमानदार, देशभक्त और कर्मठ बनना होगा। भारत की तुम आशाएँ हो। नेहरू जी के समान जीवन में उच्च आदर्श और आत्म विश्वास लेकर आगे बढ़ना है, फिर कोई भी मुश्किल तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी। जय भारत।

Wednesday, 22 October 2008

आओ हम सब दीप जलाएँ


आओ हम सब दीप जलाएँ

दीपों की इक लड़ी

बनाएँघर के अँधियारे के संग-

संगमन का भी अन्धकार

हम सब दीप जलाएँ


प्रेम प्यार से घर-घर जाएँ

दुखियों को भी गले लगाएँ

उनको भी खुशियाँ दे आएँ

आँखों में सपने दे आएँ

आओ हम सब दीप जलाएँ


इस जग में है बहुत -अँधेरा

क्रोध-वैर ने सबको घेरा

करते हैं सब तेरा-मेरा

एक दीप उनको दे आएँ

तेरा-मेरा भाव भुलाएँ

आओ हम सब दीप जलाएँ


दीप उनको दे आएँ तेरा-मेरा भाव भुलाएँआओ हम सब दीप जलाएँ

Monday, 22 September 2008

जीवन

जीवन
जीवन क्या है ?
आशाऒं- निराशाऒं का
क्रीड़ास्थल ।

एक आती है,
दूसरी जाती है ।
एक सपने जगाती है ।
कोमल भावनाऒं की
कलियाँ खिला जाती है ।

मन्द- मन्द बयार बन
उन्हें सहलाती है ।
मन मयूर खुशी से
नाचने लगता है ।

किन्तु तभी---
दूसरी लहर आती है ।
मौसम बदलता है ।
बयार की गति बढ़ जाती है ।

तूफान के झोंके आते हैं ।
हर कली को गिराते हैं ।
बहारों का मौसम
पतझड़ में बदल जाता है ।

सुख- दुःख का जीवन से
बस इतना ही नाता है ।

Saturday, 13 September 2008

हिन्दी-दिवस

हिन्दी-दिवस की आप सभी को बधाई। १४ सितम्बर १९४९ को संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया था। एक लम्बा अन्तराल बीत गया है किन्तु आज तक हम हिन्दी को वह स्थान नहीं दिला पाए जिसकी वह अधिकारिणी है। हम उसका सम्मान करते हैं किन्तु उपयोग में अंग्रेजी ही लाते हैं। अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलने के संस्कार देते हैं, अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं और गर्व से कहते हैं हिन्दी नहीं आती। क्या सुन्दर ढंग है हिन्दी के सम्मान करने का ।
वर्तमान में हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति दोनो से ही दूर होते जारहे हैं। एक विदेषी भाषा सीखना बुरा नहीं किन्तु अपनी पहचान खो बैठना बुरा है। अपनी भाषा से दूर होने के कारण हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो रहे हैं। बल्कि यों कहें कि अपनी पहचान भी खो रहे हैं। हमारी दशा उस मूर्ख जैसी है जिसके पास पूर्वजों की बहुमूल्य विरासत है किन्तु वह उसका उपयोग नहीं कर पाता और भिखारी बना रहता है।
संसार के जितने भी राष्ट्र हैं सब अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं और हम अपनी भाषा बोलने और सीखने में शर्म का अनुभव करते हैं। इसका भयानक परिणाम मैं नई पीढ़ी में देख रही हूँ। जो ना हिन्दी ठीक से पढ़ सकता है ना लिख सकता। और अंग्रेजी में पारंगत है। दोषी नई पीढ़ी नहीं दोषी हम लोग हैं। हमने उनको अपनी भाषा के संस्कार ही कहाँ दिए। हमने उसे अंग्रेजी बोलने के लिए ही प्रेरित किया। उसे कभी हिन्दी की विशेषताएँ नहीं बताई।
हमारी हिन्दी भाषा संसार की सर्वोत्तम भाषा है। इसकी वैग्यानिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। तर्क संगत है। सुमधुर और सरल है। भूमावृति के कारण नित्य नवीन शब्दों को जन्म देने वाली है। एक-एक शब्द के कितने ही पर्याय वाची हैं। हर शब्द का सटीक प्रयोग होता है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही शब्द नहीं , अलग-अलग शब्द हैं।
समन्वय की प्रवृति के कारण दूसरी भाषाओं के शब्दों को जल्दी ही अपने में समा लेती है। माँ के समान बड़े प्यार से सबको अपने आँचल में समा लेती है। यही कारण हैकि दूसरी भाषाओं के शब्द यहाँ आकर इसीके हो जाते हैं। फिर भी हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे। यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है।
आज विश्व के अनेक देश हिन्दी के महत्व को समझ रहे हैं। इसके शिक्षण की व्यवस्था कर रहे हैं, गोष्ठियाँ कर रहे हैं और हम इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।
हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं अपने देश वासियों को यही संदेश देना चाहूँगी कि यदि अपने स्वाभिमान और अपनी अस्मिता को बचा कर रखना है तो अपनी भाषा को महत्व देना सीखो। इसे ग्यान-विग्यान का वाहक बनाओ तथा इसमें संचित कोष का लाभ उठाओ। अपनी भाषा सीखो यही तुमको उन्नति दिलाएगी
यदि अपनी माँ भिखारिन रही तो पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी।
जय भारत।