Saturday, 30 August 2008
शिक्षक दिवस नज़दीक आरहा है
समाज की इस दशा को देखकर मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। सबसे अधिक विचारणीय विषय यह है कि कोई भी व्यक्ति इस व्यवसाय की ओर क्योंकर आकृष्ट हो? वेतन कम, तनाव अधिक , आलोचनाएँ पल-पल और सम्मान ? नदारद। एक फिल्म में उसे बच्चों का टिफिन खाता दिखाया जाता है और दूसरी में उसे बच्चों पर अनाचार-अत्याचार करता या बच्चों के साथ रोंमांस करता दिखाया जाता है। ऊपर से मीडिया ……मैं मानती हूँ कि बालकों को मारना,पीटना या प्रताड़ित करना उचित नहीं किन्तु सकारण कभी-कभी अध्यापक को कठोर होना पडता है। प्यार से पढ़ाने की बात सही है किन्तु कभी एक बार अध्यापक के स्थान पर आकर देखो। जो समस्याएँ अध्यापक अनुभव करते हैं उन्हें बिना समझे उन्हे अदालत में घसीटना कितना उचित है?
वर्तमान समय मे स्वः अनुशासन जैसे शब्द कोई नहीं जानता। भय बिनु होय न प्रीति भी पूरी तरह ठुकराई नहीं जा सकती। अध्यापक बच्चों को सुधारने के लिए कभी उन्हे दंडित भी करता है। बच्चों की अनुशासन हीनता सीमा का अतिक्रमण कर चुकी है। विद्यार्थी कक्षा में बेशर्मी करे और अध्यापक मूक रहे- यही चाहते हैं सब ? क्या हो सकेगा राष्ट्र निर्माण ?
आज कक्षा में दस छात्र पढ़ना चाहते हैं और ३० नहीं। तब क्यों शिक्षा को आवश्यक बना कर उनपर लादा जा रहा है?
मैं बहुत बार ऐसे छात्रों को देखकर सोचती हूँ क्यों ना पढ़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है? जबरदस्ती पढ़ाए जाने पर क्या वो शिक्षा का उचित लाभ उठा पाएँगें?
माता- पिता के पास समय नहीं है, अध्यापक को सुधार की आग्या नहीं है फिर कैसे होगा राष्ट्र निर्माण ? और सम्मान भी ना मिला तो कौन बनेगा अध्यापक ???
Monday, 21 July 2008
यह भी हो सकता है......
Monday, 14 July 2008
अबला नहीं सबला बन
कल ही मैं जून माह की कादम्बिनी पढ़ रही थी। उसमें तसलीमा जी का एक लेख बहुत प्रभावी लगा। सारंश कुछ इस प्रकार था- " दूरदर्शन के एल कार्यक्रम में महिलाओं से पूछा जा रहा था कि वे किस प्रकार के पुरूषों को ज्यादा पसन्द करती हैं। यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि अधिकतर तारिकाएँ आक्रामक पुरूष को पसन्द करती हैं। आक्रामक माने माचो मैन। कितने आश्चर्य की बात है कि पुरूष द्वारा पीड़ित,शोषित नारी पुनः आक्रामक पुरूष चाहती है "
तसलीमा जी की बात से मैं भी सहमत हूँ। पुरूष तो सदा से आक्रामक ही रहा है। फिर ऐसी कामना क्यों ?
मुझे ऐसा लगता है कि अधिकतर स्त्रियाँ स्वभाव से ही कमजोर होती हैं। इन्हें बचपन से ही कमजोर बनाया जाता है। हमेशा पिता या भाई की सुरक्षा में रहने के कारण असुरक्षा की भावना उसके दिल में बैठ गई है। एसी भावना से प्रेरित होकर वह कभी भाई की दीर्घ आयु की कामना के लिए व्रत उपवास रखती आई है तो कभी पति की लम्बी उम्र के लिए । क्या कभी किसी भाई या पति ने इनके मंगल की कामना हेतु कोई उपवास किया है ?
प्रेम और समर्पण नारी का स्वभाव है। किन्तु अपनी कमजोरी के प्रति स्वीकार्य की भावना निन्दनीय है। उसकी सोच ही उसे कमजोर बनाती है। इतिहास साक्षी है कि जब भी नारी ने अपने को कमजोर समझा उसपर अत्याचार हुआ और जब भी उसने अपने आत्मबल को जगाया, अन्यायी काँप गया। स्त्री को यदि स्वाभिमान से जीना है तो सबसे पहले अपने भीतर के डर को भगाना होगा, अपनी शक्ति को पहचानना होगा । उसके भीतर छिपा भय ही उसके शोषण का कारण है।
अतः वर्तमान में आवश्यकता है कि हर नारी पर जीवी बनना छोड़ दे। परिवार में प्यार और मधुर सम्बन्ध अवश्य होने चाहिए किन्तु कमजोरी से ऊपर उठें और अपने बच्चों को भी सशक्त बनाएँ। आत्मविश्वास को अफनी पहचान बनाएँ क्योंकि -
जब भी मैने सहायता के लिए किसी को पुकारा, स्वयं को और भी कमजोर बनाया
जब भी आत्म विश्वास को साथी बनाया, रक्त में शक्ति का संचार सा पाया।
अतः मै यही कहूँगी कि- सशक्त बनें और निर्भीक रहें। इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं जो तुम नहीं कर सकती।
यही युग की पुकार है और यही जीत का मूल मंत्र।
Saturday, 5 July 2008
स्वाभिमानी इला
आज मैं आप सबको एक सशक्त और आत्मविश्वास से पूर्ण नारी के बारे में बताऊँगी। इस बहादुर नारी का नाम था इला। इला का विवाह एक बहुत ही घमंडी तथा क्रूर इन्सान से हुआ था। विवाह के कुछ ही दिनों बाद इला को पति द्वारा बिना कारण प्रताड़ना मिलने लगी। उसका कसूर केवल इतना ही था कि वह एक सीधी-सादी भारतीय नारी थी।वह अधिक पढ़ी-लिखी भी नहीं थी इसीलिए बहुत दिनों तक पति के अत्याचार सहती रही। उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति भी खराब ही थी। वह अपनी दशा से उनको और दुखी नहीं करना चाहती थी।
किन्तु एकदिन उसके स्वाभिमान पर गहरी चोट लगी और उसने विरोध कर दिया। परिणाम स्वरूप उसे धक्के मार-मार कर बाहर निकाल दिया गया। पति के घर से पिता के घर भी वह नहीं जा सकती थी। वह रातभर घर के बाहर बैठकर रोती रही। उसके रोने की आवाज़ सुनकर पास ही रहने वाली एक सहृदय महिला ने उसको अपने स्कूल में नौकरी दिलवा दी। उनका सहारा पाकर उसे बड़ा बल मिला।
चुपचाप वह काम करती रही और अपनी पढ़ाई भी करती रही। अपनी मेहनत से उसने एम ए की परीक्षा उत्तीर्ण की।
प्रधानाचार्या ने जब उसका परीक्षा परिणाम देखा तो उसे एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी दिला दी। अब तो इला का उत्साह और बढ़ गया। वह पढ़ाने के साथ-साथ बालिकाओं में आत्मविश्वास भी जगाने लगी।
उसके अच्छे स्वभाव से आस-पास के लोग भी खुश थे। वह सभी के लिए आदर्श बन गई। उसने औरों को भी यही शिक्षा दी कि अन्याय के सामने कभी भी मत झुको। जीवन के अन्तिम दिनों में भी इला मुस्कुराती रही। अपना दर्द कभी भी किसी को नहीं दिया ,बस प्यार ही बाँटा।
आज इला नहीं है किन्तु उसका दिया हुआ विश्वास उसकी प्रत्येक छात्रा में है। काश दुनिया की हर महिला में ऐसा स्वाभिमान आजाए जिससे कोई उसपर अत्याचार करने की बात सोच भी ना सके। इला की कथा हम सब के लिए प्रेरणा है। ऐसी ही नारियों को देख प्रसाद जी ने लिखा था-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग- पग- तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।
Wednesday, 21 May 2008
एक और बलात्कार

एक और बलात्कार
इस बार महिला नहीं
एक बालिका तार-तार
बलात्कार तथा व्यभिचार की घटनाओं में प्रतिदिन इज़ाफा हो रहा है और हमारा प्रशासन मुँह ढ़ाँपकर सो रहा है। शर्म तो तब आती है,जब पुलिस कर्मी स्वयं इस घटना को अंजाम देते हैं। कौन सुनेगा पुकार जब रक्षक ही भक्षक बन जायेगा ?
इन सब घटनाओं से जहाँ एक ओर भय और आतंक का वातावरण फैलता है, वहीं बालिकाओं के हृदय में आत्म सुरक्षा के अनेक सवाल उठने लगते हैं। ऐसे में सबसे अच्छा तो यह है कि प्रत्येक माता-पिता अपनी बालिका को इसके विरूद्ध तैयार करें। मासूम बच्चियों की सुरक्षा अधिक सजगता से करें। उन्हें प्राथमिक स्तर पर ही सुरक्षा की सब जानकारी दें। उनमें आत्मविश्वास जगाएँ तथा जहाँ कोई भी कुत्सित दृष्टि से देखता या दुराचार करता पाया जाए उसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाए।
कानून से बचने पर भी समाज से बहिष्कृत होना शर्मनाक होता है। यदि उसकी माँ, बहन या बेटी ही उसका विरोध करेगी तो अपराधी शर्मसार होगा। शायद अपराध कुछ कम हों। दोषी कोई भी हो- छोटा या बड़ा, अपना या पराया-सब लोग खुलकर उसका विरोध करें। पाप को संरक्षण देना पाप को बढ़ावा देना ही होता है।
अपने पुरूष मित्रों से अनुरोध है कि अपने आस-पास इस प्रवृत्ति को रखने वाले का प्रतिकार करें। समाज में बढ़ते अपराध को रोकना सभी की जिम्मेदारी है। अपराधी को भागने या छिपने का मौका ना दें।
यदि सब लोग सहयोग करेंगें तो समाज का विकास होगा और नारी में भय के स्थान पर आत्मविश्वास आएगा।
गूँजे जग में गुंजार यही-
गाने वाला नर अगला हो
नारी तुम केवल सबला हो ।
नारी तुम केवल सबला हो ।
Wednesday, 14 May 2008
महिला आरक्षण

संसद में महिला आरक्षण का प्रश्न आज प्रत्येक व्यक्ति की चर्चा का विषय है। इसकी आवश्यकता इतनी बढ़ी है कि अन्तर्जाल पर भी चर्चा की जा रही है। चर्चा होना तो अच्छी बात है किन्तु उसका सार्थक ना होना उतना ही दुःख दाई है।
हमारे कुछ पुरूष मित्रों ने इसे नारी जाति पर प्रहार करने का तथा उनपर हँसने का मुद्धा बनाया है। मैं नहीं जानती कि यह कैसी मानसिकता है । महिलाओं के लिए हल्के शब्दों का प्रयोग करके अथवा अश्लील शब्दों की टिप्पणी देकर वे क्या साबित करना चाहते हैं ।
सत्य तो यह है कि महिला आरक्षण की चर्चा केवल दिखावटी है। कोई भी दल नहीं चाहता कि जिनका वे सदा से शोषण करते आए हैं, पैरों की जूती समझते आए हैं वे उनके साथ आकर खड़ी हो जाए। इसी कारण २० साल से यह विषय मात्र चर्चा में ही है। ना कोई इसका विरोध करता है और ना खुलकर समर्थन। उसको लाने का सार्थक कदम तो बहुत दूर की बात है। उनको लगता है कि नारी यदि सत्ता में आगई तो उनकी निरंकुशता कुछ कम हो जाएगी, उनकी कर्कशता एवं कठोरता पर अंकुश लग जाएगा तथा महिलाओं पर अत्याचार रोकने पड़ेंगें ।
अपने साथी मित्रों को मैं यह बताना चाहती हूँ कि यह पुरूष विरोधी अभियान कदापि नहीं है । इसलिए उटपटाँग शब्दावली का प्रयोग कर अपनी विकृत मानसिकता का परिचय ना दें। पुरूष और स्त्री अगर साथ चलेंगें तो समाज में सुन्दरता ही आएगी कुरुपता नहीं।
मुझे लगता है ३३ ही नही ५० स्थान महिलाओं को मिलने चाहिएँ। आज महिला बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक किसी भी क्षेत्र में कम नहीं फिर उसे आगे आने के अवसर क्यों ना दिए जाएँ? आपत्ति क्यों है ?
निश्चित रहिए -'नारी नर की शक्ति है उसकी शत्रु नहीं । आपस में दोषारोपण से सम्बन्धों में तनाव ही आएगा।
आज समय की माँग है कि नारी को उन्नत्ति के समान अवसर मिलें और खुशी-खुशी उसे उसके अधिकार दे दिए जाएँ।
Friday, 2 May 2008
कब टूटेगा अहं….?

अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी के वशीभूत होकर संसार में बड़े-बड़े पाप और दुष्कृत्य किए जाते हैं। पुरूषों में यह अहं और भी विकृत रूप में सामने आता है। सृष्टि के आरम्भ से ही नारी उसके इस अहं का शिकार होती
रही है।
रावण के अहंकार का शिकार हुई सीता, दुर्योधन के अहं का द्रोपदी । वर्तमान में भी यह अहं अनवरत रूप से नारी को शिकार बना रहा है। कुछ दिन पहले ही समाचार पत्र में इस अहंकार का विकृत रूप सामने आया। पति के साथ सहयोग करने वाली एक भावुक नारी का। पति अपनी बुरी हरकतों से कानून की गिरफ्त में आया तो वह पीड़ा से कराह उठी। पति का सुख-दुख में साथ निभाने का वचन याद आया। 'मैं तुम्हें कानून के शिकंजे से बचाउँगी' का उद्घोष कर उसने अपनी पढाई प्रारम्भ की। अपनी तीव्र इच्छा शक्ति के बल पर एक सफल वकील बनी और सावित्री के समान पति को मुक्त कराया।
किन्तु नारी की विडम्बना पत्नी के उपकार को मानने के स्थान पर पति उसकी ख्याति से जल उठा। भला जिस नारी उसने सदा कदमों पर झुका देखा था उसका अहंकार से दप्त मस्तक वो कैसे देखता। उसके अहंकार ने उसे पशु बना दिया और अपनी ही हितैषी, सुख-दुख की साथी संगिनी को क्रूरता से मार डाला।
यह घटना नारी की अस्मिता पर एक घिनौना दाग छोड़ती है। किस पर विश्वास करे वह ? क्या अपराध था उसका ?
आधुनिकता का दम्भ भरने वाले समाज में आज भी नारी इस अत्याचार की शिकार है। क्या इससे नारी की अपने संस्कारों के प्रति आस्था कम नहीं होती ? बरबस ही दिल में एक टीस सी उठी-
फिर उठी है टीस कोई
चिर व्यथित मेरे हृदय में
उठ रहे हैं प्रश्न कितने
शून्य पर- नीले- निलय में