Tuesday, 16 December 2008
Monday, 17 November 2008
चाचा नेहरू के पत्र
चाचा नेहरू एक ऐसे व्यक्तित्व रहे जिनकी आँखों में बच्चों के लिये बेहद प्रेम था तथा उनकी बाँहें बच्चों को गोद में लेने के लिए सदा आतुर रहती थी। बच्चों से उनका प्रेम असीम था। जानते हैं बच्चों! आज़ादी के लिए जब वे जेल गए, तब अपना अधिकतर समय उन्होने पत्र लेखन में बिताया। वैसे तो वे पत्र उन्होने अपनी बेटी इन्दु के नाम लिखे थे किन्तु हर बच्चा उनसे बहुत कुछ सीख सकता है। उनके कुछ उदाहरण आपके लिए प्रस्तुत कर रही हूँ-
प्यारे बच्चों !
तुम लोगों के बीच रहना मैं पसंद करता हूँ। तुमसे बातें करने में और तुम्हारे साथ खेलने में सचमुच मुझे बड़ा मज़ा आता है। थोड़ी देर के लिए मैं यह भूल जाता हूँ कि मैं बेहद बूढ़ा हो चला हूँ और मेरा बचपन मुझसे सैंकड़ो हज़ारों कोस दूर हो गया है ..... हमारा देश एक बहुत बड़ा देश है और हम सब को-मिलकर अपने देश के लिए बहुत कुछ करना है। हममें से हर कोई अगर अपने हिस्से का काम पूरा करता रहेगा तो इन सब कामों का ढेर लगता रहेगा और हमारा मुल्क तरक्की के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ेगा।
२ मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता की सभ्यता का कुछ हाल बताना चाहता हुँ। लेकिन इससे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का क्या अर्थ है। अच्छा करना, सुधारना , जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना। यह सब जानने के लिए तुमको खुद सब कथाओं को पढ़ना चाहिए।
३ अगर तुम मेरे पास होते तो मैं तुमसे उस खूबसूरत दुनिया के बारे में बातें करना पसन्द करता। मैं तुमसे फूलों और पेड़ों , परिन्दों और जानचरों, सितारों और पहाड़ों हिम की नदियों और ऐसी दूसरी अनेक चीजों के बारे में बात करता जो हमारे इर्द-गिर्द हैं। उन्होने ऐसे ही अनेक पत्र और लेख लिखे जो आज भी हम सबके लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनमें कुछ अंश तो ऐसे हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता । एक बार उन्होने कहा था- यदि कोई मुझे याद करर तो मैं चाहूँगा कि वह यह कहे कि इस आदमी ने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तान से प्यार किया और बदले में उन्होने भी उसे उतना ही चाहा और बेहद मुहब्बत दी। आपका और मेरा काम आज और कल के भारत को बनाना है। लेकिन उसके बनाने के लिए हमें अपने प्राचीन इतिहास को कुछ समझना है और उसमें जो अच्छी बातें हैं , उनका लाभ उठाना है। उसमें जो बुरी बातें हैं उनसे बचना है। लोकतंत्र का मतलब मैं यह समझता हूँ कि समस्याएँ शान्ति पूर्वक सुलझाई जाएँ। अगर आदमी में दहशत भर जाए तो वह ना ठीक से सोच सकता है, ना काम कर सकता है। खतरा चाहे मौजूद हो या आने वाला हो डर से उसका सामना नहीं किया जा सकता।
शान्ति और सत्य का रास्ता ही मनुष्य का सच्चा रास्ता है।
उन्होने कहा- परिवर्तन जरूरी है, लेकिन उसके साथ परम्परा भी जरूरी है। भविष्य की इमारत वर्तमान और अतीत की बुनियाद पर ही खड़ी होती है। अगर अपने इतिहास को हम भुला देंगें और उसे छोड़ देंगें तो हमारी जड़ें कट जाएँगी और हमारा जीवन रस सूख जाएगा।
उन्होने बच्चों को कहा- बुराई के सामने कभी सिर न झुकाना चाहिए। लेकिन बुराई का सामना डर और गुस्से से और बुरी बातों से नहीं करना चाहिए। बुराई का सामना करते समय हमें दिमाग ठंडा रखना चाहिए।
वे गरीबी और अभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसीलिए कहा- जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में गरीबी और अभाव रहेगा, दुनिया में खतरा भी बना रहेगा। धर्म का सम्बंन्ध नैतिक और सदाचार की बातों से है।
हिंसा का रास्ता वे खतरे का रास्ता बताते थे। वे काम को महत्व देते थे। इसीलिए इतने बड़े पद पर होने पर भी दिन में १८ से २० घंटे काम करते थे। वे कहते थे- मैं ऐसे आदमी चाहता हूँ जो काम को धर्म समझ कर करें। जो बुराई के सामने सिर ना झुकाएँ। सच्चाई से लड़ने के लिए तैयार रहें। उन्होने बच्चों को देश सेवा की प्रेरणा देते हुए कहा- भारत की सेवा से अभिप्राय करोड़ों लोगों की सेवा से है। इसका अर्थ है कि गरीबी, अग्यानता और असमानता समाप्त कर दी जाए। हर आँख से आँसू पोंछने का प्रयास किया जाए। परंतु जब तक लोगों की आँखों में आँसू हैं और वे पीड़ित हैं तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा।
उन्होने कहा- भारत की जनता आजादी पा चुकी है, किन्तु इसके मीठे फल का स्वाद चखने के लिए उसे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी होंगीं।
बच्चों! नेहरू जी के विषय में जितना भी लिखूँ कम है। बस यह समझ लो कि उनको बच्चों से बहुत आशाएँ थीं और आपको उनके आदर्शों पर चलकर उनका सपना पूरा करना है। ईमानदार, देशभक्त और कर्मठ बनना होगा। भारत की तुम आशाएँ हो। नेहरू जी के समान जीवन में उच्च आदर्श और आत्म विश्वास लेकर आगे बढ़ना है, फिर कोई भी मुश्किल तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी। जय भारत।
प्यारे बच्चों !
तुम लोगों के बीच रहना मैं पसंद करता हूँ। तुमसे बातें करने में और तुम्हारे साथ खेलने में सचमुच मुझे बड़ा मज़ा आता है। थोड़ी देर के लिए मैं यह भूल जाता हूँ कि मैं बेहद बूढ़ा हो चला हूँ और मेरा बचपन मुझसे सैंकड़ो हज़ारों कोस दूर हो गया है ..... हमारा देश एक बहुत बड़ा देश है और हम सब को-मिलकर अपने देश के लिए बहुत कुछ करना है। हममें से हर कोई अगर अपने हिस्से का काम पूरा करता रहेगा तो इन सब कामों का ढेर लगता रहेगा और हमारा मुल्क तरक्की के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ेगा।
२ मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता की सभ्यता का कुछ हाल बताना चाहता हुँ। लेकिन इससे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का क्या अर्थ है। अच्छा करना, सुधारना , जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना। यह सब जानने के लिए तुमको खुद सब कथाओं को पढ़ना चाहिए।
३ अगर तुम मेरे पास होते तो मैं तुमसे उस खूबसूरत दुनिया के बारे में बातें करना पसन्द करता। मैं तुमसे फूलों और पेड़ों , परिन्दों और जानचरों, सितारों और पहाड़ों हिम की नदियों और ऐसी दूसरी अनेक चीजों के बारे में बात करता जो हमारे इर्द-गिर्द हैं। उन्होने ऐसे ही अनेक पत्र और लेख लिखे जो आज भी हम सबके लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनमें कुछ अंश तो ऐसे हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता । एक बार उन्होने कहा था- यदि कोई मुझे याद करर तो मैं चाहूँगा कि वह यह कहे कि इस आदमी ने पूरे दिल और दिमाग से हिन्दुस्तान से प्यार किया और बदले में उन्होने भी उसे उतना ही चाहा और बेहद मुहब्बत दी। आपका और मेरा काम आज और कल के भारत को बनाना है। लेकिन उसके बनाने के लिए हमें अपने प्राचीन इतिहास को कुछ समझना है और उसमें जो अच्छी बातें हैं , उनका लाभ उठाना है। उसमें जो बुरी बातें हैं उनसे बचना है। लोकतंत्र का मतलब मैं यह समझता हूँ कि समस्याएँ शान्ति पूर्वक सुलझाई जाएँ। अगर आदमी में दहशत भर जाए तो वह ना ठीक से सोच सकता है, ना काम कर सकता है। खतरा चाहे मौजूद हो या आने वाला हो डर से उसका सामना नहीं किया जा सकता।
शान्ति और सत्य का रास्ता ही मनुष्य का सच्चा रास्ता है।
उन्होने कहा- परिवर्तन जरूरी है, लेकिन उसके साथ परम्परा भी जरूरी है। भविष्य की इमारत वर्तमान और अतीत की बुनियाद पर ही खड़ी होती है। अगर अपने इतिहास को हम भुला देंगें और उसे छोड़ देंगें तो हमारी जड़ें कट जाएँगी और हमारा जीवन रस सूख जाएगा।
उन्होने बच्चों को कहा- बुराई के सामने कभी सिर न झुकाना चाहिए। लेकिन बुराई का सामना डर और गुस्से से और बुरी बातों से नहीं करना चाहिए। बुराई का सामना करते समय हमें दिमाग ठंडा रखना चाहिए।
वे गरीबी और अभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसीलिए कहा- जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में गरीबी और अभाव रहेगा, दुनिया में खतरा भी बना रहेगा। धर्म का सम्बंन्ध नैतिक और सदाचार की बातों से है।
हिंसा का रास्ता वे खतरे का रास्ता बताते थे। वे काम को महत्व देते थे। इसीलिए इतने बड़े पद पर होने पर भी दिन में १८ से २० घंटे काम करते थे। वे कहते थे- मैं ऐसे आदमी चाहता हूँ जो काम को धर्म समझ कर करें। जो बुराई के सामने सिर ना झुकाएँ। सच्चाई से लड़ने के लिए तैयार रहें। उन्होने बच्चों को देश सेवा की प्रेरणा देते हुए कहा- भारत की सेवा से अभिप्राय करोड़ों लोगों की सेवा से है। इसका अर्थ है कि गरीबी, अग्यानता और असमानता समाप्त कर दी जाए। हर आँख से आँसू पोंछने का प्रयास किया जाए। परंतु जब तक लोगों की आँखों में आँसू हैं और वे पीड़ित हैं तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा।
उन्होने कहा- भारत की जनता आजादी पा चुकी है, किन्तु इसके मीठे फल का स्वाद चखने के लिए उसे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी होंगीं।
बच्चों! नेहरू जी के विषय में जितना भी लिखूँ कम है। बस यह समझ लो कि उनको बच्चों से बहुत आशाएँ थीं और आपको उनके आदर्शों पर चलकर उनका सपना पूरा करना है। ईमानदार, देशभक्त और कर्मठ बनना होगा। भारत की तुम आशाएँ हो। नेहरू जी के समान जीवन में उच्च आदर्श और आत्म विश्वास लेकर आगे बढ़ना है, फिर कोई भी मुश्किल तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी। जय भारत।
Wednesday, 22 October 2008
आओ हम सब दीप जलाएँ

आओ हम सब दीप जलाएँ
दीपों की इक लड़ी
बनाएँघर के अँधियारे के संग-
संगमन का भी अन्धकार
हम सब दीप जलाएँ
प्रेम प्यार से घर-घर जाएँ
दुखियों को भी गले लगाएँ
उनको भी खुशियाँ दे आएँ
आँखों में सपने दे आएँ
आओ हम सब दीप जलाएँ
इस जग में है बहुत -अँधेरा
क्रोध-वैर ने सबको घेरा
करते हैं सब तेरा-मेरा
एक दीप उनको दे आएँ
तेरा-मेरा भाव भुलाएँ
आओ हम सब दीप जलाएँ
दीप उनको दे आएँ तेरा-मेरा भाव भुलाएँआओ हम सब दीप जलाएँ
Monday, 22 September 2008
जीवन
जीवन
जीवन क्या है ?
आशाऒं- निराशाऒं का
क्रीड़ास्थल ।
एक आती है,
दूसरी जाती है ।
एक सपने जगाती है ।
कोमल भावनाऒं की
कलियाँ खिला जाती है ।
मन्द- मन्द बयार बन
उन्हें सहलाती है ।
मन मयूर खुशी से
नाचने लगता है ।
किन्तु तभी---
दूसरी लहर आती है ।
मौसम बदलता है ।
बयार की गति बढ़ जाती है ।
तूफान के झोंके आते हैं ।
हर कली को गिराते हैं ।
बहारों का मौसम
पतझड़ में बदल जाता है ।
सुख- दुःख का जीवन से
बस इतना ही नाता है ।
जीवन क्या है ?
आशाऒं- निराशाऒं का
क्रीड़ास्थल ।
एक आती है,
दूसरी जाती है ।
एक सपने जगाती है ।
कोमल भावनाऒं की
कलियाँ खिला जाती है ।
मन्द- मन्द बयार बन
उन्हें सहलाती है ।
मन मयूर खुशी से
नाचने लगता है ।
किन्तु तभी---
दूसरी लहर आती है ।
मौसम बदलता है ।
बयार की गति बढ़ जाती है ।
तूफान के झोंके आते हैं ।
हर कली को गिराते हैं ।
बहारों का मौसम
पतझड़ में बदल जाता है ।
सुख- दुःख का जीवन से
बस इतना ही नाता है ।
Saturday, 13 September 2008
हिन्दी-दिवस
हिन्दी-दिवस की आप सभी को बधाई। १४ सितम्बर १९४९ को संविधान में हिन्दी को राष्ट्र भाषा स्वीकार किया गया था। एक लम्बा अन्तराल बीत गया है किन्तु आज तक हम हिन्दी को वह स्थान नहीं दिला पाए जिसकी वह अधिकारिणी है। हम उसका सम्मान करते हैं किन्तु उपयोग में अंग्रेजी ही लाते हैं। अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलने के संस्कार देते हैं, अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं और गर्व से कहते हैं हिन्दी नहीं आती। क्या सुन्दर ढंग है हिन्दी के सम्मान करने का ।
वर्तमान में हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति दोनो से ही दूर होते जारहे हैं। एक विदेषी भाषा सीखना बुरा नहीं किन्तु अपनी पहचान खो बैठना बुरा है। अपनी भाषा से दूर होने के कारण हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो रहे हैं। बल्कि यों कहें कि अपनी पहचान भी खो रहे हैं। हमारी दशा उस मूर्ख जैसी है जिसके पास पूर्वजों की बहुमूल्य विरासत है किन्तु वह उसका उपयोग नहीं कर पाता और भिखारी बना रहता है।
संसार के जितने भी राष्ट्र हैं सब अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं और हम अपनी भाषा बोलने और सीखने में शर्म का अनुभव करते हैं। इसका भयानक परिणाम मैं नई पीढ़ी में देख रही हूँ। जो ना हिन्दी ठीक से पढ़ सकता है ना लिख सकता। और अंग्रेजी में पारंगत है। दोषी नई पीढ़ी नहीं दोषी हम लोग हैं। हमने उनको अपनी भाषा के संस्कार ही कहाँ दिए। हमने उसे अंग्रेजी बोलने के लिए ही प्रेरित किया। उसे कभी हिन्दी की विशेषताएँ नहीं बताई।
हमारी हिन्दी भाषा संसार की सर्वोत्तम भाषा है। इसकी वैग्यानिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। तर्क संगत है। सुमधुर और सरल है। भूमावृति के कारण नित्य नवीन शब्दों को जन्म देने वाली है। एक-एक शब्द के कितने ही पर्याय वाची हैं। हर शब्द का सटीक प्रयोग होता है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही शब्द नहीं , अलग-अलग शब्द हैं।
समन्वय की प्रवृति के कारण दूसरी भाषाओं के शब्दों को जल्दी ही अपने में समा लेती है। माँ के समान बड़े प्यार से सबको अपने आँचल में समा लेती है। यही कारण हैकि दूसरी भाषाओं के शब्द यहाँ आकर इसीके हो जाते हैं। फिर भी हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे। यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है।
आज विश्व के अनेक देश हिन्दी के महत्व को समझ रहे हैं। इसके शिक्षण की व्यवस्था कर रहे हैं, गोष्ठियाँ कर रहे हैं और हम इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।
हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं अपने देश वासियों को यही संदेश देना चाहूँगी कि यदि अपने स्वाभिमान और अपनी अस्मिता को बचा कर रखना है तो अपनी भाषा को महत्व देना सीखो। इसे ग्यान-विग्यान का वाहक बनाओ तथा इसमें संचित कोष का लाभ उठाओ। अपनी भाषा सीखो यही तुमको उन्नति दिलाएगी
यदि अपनी माँ भिखारिन रही तो पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी।
जय भारत।
वर्तमान में हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति दोनो से ही दूर होते जारहे हैं। एक विदेषी भाषा सीखना बुरा नहीं किन्तु अपनी पहचान खो बैठना बुरा है। अपनी भाषा से दूर होने के कारण हम अपनी संस्कृति से भी दूर हो रहे हैं। बल्कि यों कहें कि अपनी पहचान भी खो रहे हैं। हमारी दशा उस मूर्ख जैसी है जिसके पास पूर्वजों की बहुमूल्य विरासत है किन्तु वह उसका उपयोग नहीं कर पाता और भिखारी बना रहता है।
संसार के जितने भी राष्ट्र हैं सब अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं और हम अपनी भाषा बोलने और सीखने में शर्म का अनुभव करते हैं। इसका भयानक परिणाम मैं नई पीढ़ी में देख रही हूँ। जो ना हिन्दी ठीक से पढ़ सकता है ना लिख सकता। और अंग्रेजी में पारंगत है। दोषी नई पीढ़ी नहीं दोषी हम लोग हैं। हमने उनको अपनी भाषा के संस्कार ही कहाँ दिए। हमने उसे अंग्रेजी बोलने के लिए ही प्रेरित किया। उसे कभी हिन्दी की विशेषताएँ नहीं बताई।
हमारी हिन्दी भाषा संसार की सर्वोत्तम भाषा है। इसकी वैग्यानिकता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है। तर्क संगत है। सुमधुर और सरल है। भूमावृति के कारण नित्य नवीन शब्दों को जन्म देने वाली है। एक-एक शब्द के कितने ही पर्याय वाची हैं। हर शब्द का सटीक प्रयोग होता है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही शब्द नहीं , अलग-अलग शब्द हैं।
समन्वय की प्रवृति के कारण दूसरी भाषाओं के शब्दों को जल्दी ही अपने में समा लेती है। माँ के समान बड़े प्यार से सबको अपने आँचल में समा लेती है। यही कारण हैकि दूसरी भाषाओं के शब्द यहाँ आकर इसीके हो जाते हैं। फिर भी हम इसका लाभ नहीं उठा पा रहे। यह हमारा दुर्भाग्य ही तो है।
आज विश्व के अनेक देश हिन्दी के महत्व को समझ रहे हैं। इसके शिक्षण की व्यवस्था कर रहे हैं, गोष्ठियाँ कर रहे हैं और हम इसकी उपेक्षा कर रहे हैं।
हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं अपने देश वासियों को यही संदेश देना चाहूँगी कि यदि अपने स्वाभिमान और अपनी अस्मिता को बचा कर रखना है तो अपनी भाषा को महत्व देना सीखो। इसे ग्यान-विग्यान का वाहक बनाओ तथा इसमें संचित कोष का लाभ उठाओ। अपनी भाषा सीखो यही तुमको उन्नति दिलाएगी
यदि अपनी माँ भिखारिन रही तो पराई भी कुछ नहीं दे पाएगी।
जय भारत।
Saturday, 30 August 2008
शिक्षक दिवस नज़दीक आरहा है
शिक्षक दिवस नज़दीक आरहा है, किन्तु शिक्षकों की दशा देख मन घबरा रहा है। वर्तमान में सर्वाधिक चर्चित एवं आरोपित शिक्षक ही है। वह अनेक आलोचनाओं का शिकार हो रहा है। उसकी कर्तव्य निष्ठा पर अनेक सवाल उठाए जा रहे हैं। फिल्म जगत ने उसकी इस छवि को बिगाड़ने में विशिष्ट भूमिका निभाई है। ऐसे में इस व्यवसाय की ओर से यदि नई पीढ़ी उदासीन हो तो आश्चर्य ही क्या ?
समाज की इस दशा को देखकर मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। सबसे अधिक विचारणीय विषय यह है कि कोई भी व्यक्ति इस व्यवसाय की ओर क्योंकर आकृष्ट हो? वेतन कम, तनाव अधिक , आलोचनाएँ पल-पल और सम्मान ? नदारद। एक फिल्म में उसे बच्चों का टिफिन खाता दिखाया जाता है और दूसरी में उसे बच्चों पर अनाचार-अत्याचार करता या बच्चों के साथ रोंमांस करता दिखाया जाता है। ऊपर से मीडिया ……मैं मानती हूँ कि बालकों को मारना,पीटना या प्रताड़ित करना उचित नहीं किन्तु सकारण कभी-कभी अध्यापक को कठोर होना पडता है। प्यार से पढ़ाने की बात सही है किन्तु कभी एक बार अध्यापक के स्थान पर आकर देखो। जो समस्याएँ अध्यापक अनुभव करते हैं उन्हें बिना समझे उन्हे अदालत में घसीटना कितना उचित है?
वर्तमान समय मे स्वः अनुशासन जैसे शब्द कोई नहीं जानता। भय बिनु होय न प्रीति भी पूरी तरह ठुकराई नहीं जा सकती। अध्यापक बच्चों को सुधारने के लिए कभी उन्हे दंडित भी करता है। बच्चों की अनुशासन हीनता सीमा का अतिक्रमण कर चुकी है। विद्यार्थी कक्षा में बेशर्मी करे और अध्यापक मूक रहे- यही चाहते हैं सब ? क्या हो सकेगा राष्ट्र निर्माण ?
आज कक्षा में दस छात्र पढ़ना चाहते हैं और ३० नहीं। तब क्यों शिक्षा को आवश्यक बना कर उनपर लादा जा रहा है?
मैं बहुत बार ऐसे छात्रों को देखकर सोचती हूँ क्यों ना पढ़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है? जबरदस्ती पढ़ाए जाने पर क्या वो शिक्षा का उचित लाभ उठा पाएँगें?
माता- पिता के पास समय नहीं है, अध्यापक को सुधार की आग्या नहीं है फिर कैसे होगा राष्ट्र निर्माण ? और सम्मान भी ना मिला तो कौन बनेगा अध्यापक ???
समाज की इस दशा को देखकर मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। सबसे अधिक विचारणीय विषय यह है कि कोई भी व्यक्ति इस व्यवसाय की ओर क्योंकर आकृष्ट हो? वेतन कम, तनाव अधिक , आलोचनाएँ पल-पल और सम्मान ? नदारद। एक फिल्म में उसे बच्चों का टिफिन खाता दिखाया जाता है और दूसरी में उसे बच्चों पर अनाचार-अत्याचार करता या बच्चों के साथ रोंमांस करता दिखाया जाता है। ऊपर से मीडिया ……मैं मानती हूँ कि बालकों को मारना,पीटना या प्रताड़ित करना उचित नहीं किन्तु सकारण कभी-कभी अध्यापक को कठोर होना पडता है। प्यार से पढ़ाने की बात सही है किन्तु कभी एक बार अध्यापक के स्थान पर आकर देखो। जो समस्याएँ अध्यापक अनुभव करते हैं उन्हें बिना समझे उन्हे अदालत में घसीटना कितना उचित है?
वर्तमान समय मे स्वः अनुशासन जैसे शब्द कोई नहीं जानता। भय बिनु होय न प्रीति भी पूरी तरह ठुकराई नहीं जा सकती। अध्यापक बच्चों को सुधारने के लिए कभी उन्हे दंडित भी करता है। बच्चों की अनुशासन हीनता सीमा का अतिक्रमण कर चुकी है। विद्यार्थी कक्षा में बेशर्मी करे और अध्यापक मूक रहे- यही चाहते हैं सब ? क्या हो सकेगा राष्ट्र निर्माण ?
आज कक्षा में दस छात्र पढ़ना चाहते हैं और ३० नहीं। तब क्यों शिक्षा को आवश्यक बना कर उनपर लादा जा रहा है?
मैं बहुत बार ऐसे छात्रों को देखकर सोचती हूँ क्यों ना पढ़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है? जबरदस्ती पढ़ाए जाने पर क्या वो शिक्षा का उचित लाभ उठा पाएँगें?
माता- पिता के पास समय नहीं है, अध्यापक को सुधार की आग्या नहीं है फिर कैसे होगा राष्ट्र निर्माण ? और सम्मान भी ना मिला तो कौन बनेगा अध्यापक ???
Monday, 21 July 2008
यह भी हो सकता है......
नारी स्वाधीनता, नारी सशक्तीकरण आदि विषयों पर बहुत पढ़ा और लिखा भी। अपनी अस्मिता एवं अपने अधिकारों की बात से मस्तक गर्व से ऊँचा कर इस बार जब मैं घर गई तो माँ को देख आँखों में आँसू आगए। उनको एक लम्बा सा भाषण दिया, अपनी डीँगें हाँकी। माँ चुपचाप सुनती रही। फिर अचानक उन्होने मुझसे प्रश्न किया- क्या तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो? क्या आधुनिक कहलाने वाली नारी के सारे निर्णय अपने होते हैं ? मैं सकपका गई, किन्तु मैंने हार बिना माने हुए कहा- ‘हाँ । मैं अपने जीवन के सारे निर्णय स्वयं लेती हूँ। तुम्हारी तरह गिड़गिड़ाती नहीं। जो बात पसन्द नहीं साफ़ मना कर देती हूँ’। माँ मुसकुराते हुए बोली- ‘तुम्हें किसने कहा कि मैं अपने जीवन के निर्णय अपनेआप नहीं लेती ? अरे! मैने भी सारा जीवन स्वाधीनता से बिताया है। अन्तर बस इतना ही है कि मैने कभी किसी को यह जताया नहीं’।मुझे यह बात समझ नहीं आई। मैने प्रश्न वाचक दृष्टि से माँ की ओर देखा। माँ ने हँसते हुए कहा- जब काम बिना लड़ाई के चल जाए तो लड़ना क्यों?मतलब?????? देखो! हम लोगों ने भी अपनी ज़िन्दगी अपने ढँग से जी है। बस पति की निन्दा नहीं की। हर पल उसे यह विश्वास दिलाया कि उसके बिना हमारा अस्तित्व ही नहीं है। हर दम उससे डरने का नाटक किया और घर पर राज किया। पर कैसे? मैने पूछा ।‘सुनो बिटिया! आदमी बहुत बड़ा अहंकारी जीव होता है। उसे बस विश्वास दिलाए रखो कि हम उनसे डरते हैं। वह संतुष्ट हो जाएगा’- माँ ने मुसकुराते हुए कहा। हम लोग भी सदा आज़ाद रहे किन्तु कभी बिना काम झगड़ा ना करो तो शान्ति बनी रहती है। उसको इतनी फुरसत ही कहाँ है कि वह घर पर नज़र डाले। बस उसके अहंकार को चुनौती मत दो, सदा उसके सामने डरी-डरी रहो-माँ ने मुसकुराते हुए कहा। मैं माँ की बात पर हँस पड़ी- माँ तुम्हारी पीढ़ी बहुत होशियार थी। बहतु चालाक भी। और क्या ? तुम आजकल की पढ़ी-लिखी औरतें बिना कारण झगड़ा करती हैं। सारा दिन नौकरी करेंगीं, घर और बाहर दोनो सँभालेंगी और अपने को होशियार समझकर घर पर झगड़ा करेंगी। फिर भी समझती हैं कि वो ज्यादा होशियार और सुखी हैं।माँ की बातों को सुनकर मैं कुछ सोचने पर मज़बूर हो गई। वास्तव में माँ ठीक ही तो कह रही थी। बहस और लड़ाई करके आज नारी रिश्तों को और भी दूभर ही तो बना रही है। स्त्री-पुरूष एक दूसरे के विरोधी नहीं ,पूरक हैं फिर इतना विवाद क्यों?
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