Wednesday, 21 May 2008

एक और बलात्कार


एक और बलात्कार

इस बार महिला नहीं

एक बालिका तार-तार

बलात्कार तथा व्यभिचार की घटनाओं में प्रतिदिन इज़ाफा हो रहा है और हमारा प्रशासन मुँह ढ़ाँपकर सो रहा है। शर्म तो तब आती है,जब पुलिस कर्मी स्वयं इस घटना को अंजाम देते हैं। कौन सुनेगा पुकार जब रक्षक ही भक्षक बन जायेगा ?

इन सब घटनाओं से जहाँ एक ओर भय और आतंक का वातावरण फैलता है, वहीं बालिकाओं के हृदय में आत्म सुरक्षा के अनेक सवाल उठने लगते हैं। ऐसे में सबसे अच्छा तो यह है कि प्रत्येक माता-पिता अपनी बालिका को इसके विरूद्ध तैयार करें। मासूम बच्चियों की सुरक्षा अधिक सजगता से करें। उन्हें प्राथमिक स्तर पर ही सुरक्षा की सब जानकारी दें। उनमें आत्मविश्वास जगाएँ तथा जहाँ कोई भी कुत्सित दृष्टि से देखता या दुराचार करता पाया जाए उसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाए।

कानून से बचने पर भी समाज से बहिष्कृत होना शर्मनाक होता है। यदि उसकी माँ, बहन या बेटी ही उसका विरोध करेगी तो अपराधी शर्मसार होगा। शायद अपराध कुछ कम हों। दोषी कोई भी हो- छोटा या बड़ा, अपना या पराया-सब लोग खुलकर उसका विरोध करें। पाप को संरक्षण देना पाप को बढ़ावा देना ही होता है।

अपने पुरूष मित्रों से अनुरोध है कि अपने आस-पास इस प्रवृत्ति को रखने वाले का प्रतिकार करें। समाज में बढ़ते अपराध को रोकना सभी की जिम्मेदारी है। अपराधी को भागने या छिपने का मौका ना दें।

यदि सब लोग सहयोग करेंगें तो समाज का विकास होगा और नारी में भय के स्थान पर आत्मविश्वास आएगा।

गूँजे जग में गुंजार यही-

गाने वाला नर अगला हो

नारी तुम केवल सबला हो ।

नारी तुम केवल सबला हो

7 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत सही बात कही है आपने - "पाप को संरक्षण देना पाप को बढ़ावा देना ही होता है"। वलात्कार के अपराधियों का सामाजिक और पारिवारिक दोनों रूप से वहिष्कार होना चाहिए. अदालतों में तो मामले लंबे लटक जाते हैं. वलात्कारियों को सजा मिलेगी भी या नहीं इस का भी कोई भरोसा नहीं है. अगर वलात्कारी का परिवार उस का वहिष्कार करे तो इन अपराधों में कमी आ सकती है. यह न होने पर समाज वलात्कारी के परिवार का ही वहिष्कार कर दे. यही एक उपाय है. पुलिस और अदालतों पर विश्वास करने से यह समस्या हल नहीं होगी.

DR.ANURAG ARYA said...

dukhad hai....vakai dukhad hai.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

शर्मनाक !

DUSHYANT said...

adbhut..likhtee rahen....

महेन said...

शोभा जी शायद आप विश्वास करना चाहें कि मैं डेढ़ पसली का आदमी एक बार कालेज के एक पहलवान से पिटने से बचा था, क्योंकि मैनें उसे अपनी एक महिला मित्र को परेशान करने से मना कर दिया था। प्रतिरोध करना मेरे हाथ में है मगर यदि बात वहाँ नहीं संभल रही तो दुविधा होती है कि क्या किया जाये। मैनें इससे संबंधित विषय पर दो आलेख लिखे थे कुछ दिनों पहले http://mahenmehta.blogspot.com/2008/06/modern-girl.html

शुभम।

UjjawalTrivedi said...

प्रिय शोभा, आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई- अच्छा लिखती हैं लिखती रहिये- मेरा उत्साह बढ़ाने का शुक्रिया।

Keshav Dayal said...

aadarniya shobha ji
Mera utsaah bardhan karane ke liye dhanyawwad. Maine aapke blogs parhe. Aapaka prayaas sarahniya hai. isake liye aaap dhanyawwad ki paatra hain. Aap mujhe http://shrikrishna4@rediffiLand.com par bhi parh sakatin hain.